शुक्रवार, 30 जून 2017

बुद्ध हो चला हूँ मैं !

                                                            चित्र साभार गुगुल। 
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
दुःख मुझको थामने
हरपल है पीछे सामने
अविचल मौन निहारता
अदम्य ओज ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
दर्द मुझको ताकती
ह्रदय में के झांकती
आँखें स्थिर आलोकमय
टीस में पला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
कष्ट से क्लेश से
मन मरा कभी द्वेष से
रंज में शतरंज में
मन-युद्ध में ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
अस्त्र से शस्त्र से
शासकों सा वस्त्र से
बस प्रेम में सजा धजा
शांति के रंग से -
रची हुई कला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
अहं में तरंग में
राज पाट जंग में
निर्लोभ निष्पक्ष निर्वाह में
हर साँस ही ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
आग है राग है
जन्म से वैराग है
हर राह मैंने खुद चुनी
इस ज्ञान से छला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
रूप रंग रास में
भोग मय विलास में
भव्य भवन निवास में
ऐश्वर्य सब दला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
भय भ्रम भ्रांति सब
कर्तव्य कर्म क्रांति सब
मोह मर्म माया भी
हर रोग से जला हूँ मैं!
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
प्राण हरूँ रौंदूं रक्त
खुद को ढूँढू, छोडूं तख्त
सत्य से हुआ विरक़्त
शून्य में घुला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
सदी का ख़्वाब जल रहा
विश्वास पर जला नहीं
वक़्त की ऱाख जय तिलक सा
मस्तक पे ले मला हूँ मैं। 
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
है कतार रिश्ते यार की
अपनों ही से घिरा हुआ
पर अज़नबी है हर नज़र
नगर डगर सफ़र -
सब ही में अकेला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!


©raj

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