गुरुवार, 22 जून 2017

बहुरंगी भाग ३

बेचैनियों में जकड़ा वक़्त,
अहसासों को बयां नहीं कर पाती है।
ज़ाहिर हो दर्द तो होता है,
हर साँस सीने में एक नमी उतर जाती है।।

मिल तो जाते हैं किसी हाल में हमराही,
बयान हाल हो पाता है अक्सर !

होना भी बहुत कम नहीं है,
बस होने का एहसास हो।
मिलना हो मुमक़िन सही,
नज़रों को तुम्हारी तलाश हो।।

मुस्कुराते हैं या नजरों से मौज़ुदगी जताते हैं ,
फ़क़त सुकून सा है ये, आप यहाँ आते जाते हैं।

आने का इत्तला, जान पाने का सुराग ,
अल्फ़ाज़ तुम्हें ही ढूंढते हैं, सुनाने को अपनी ज़ज़्बात।

मुस्कुराकर जोड़ते हो दिल,
या तोड़ती हो उम्मीदें ,
हर हाल में बस,
तुम्हें ही ढूंढती हैं ये दीदें।

नजरों के सहारे उतर जाऊं कहीं,
अब मेरी तरफ़ वो निगाहें उठाती ही नहीं।
दिल में जो मौजूद हूँ उसका क्या करोगे,
जुबां खोल कर इतना भी बताती ही नहीं।।

अब तो शिकायत का भी हक़ नहीं देती
बेशक़ तुम्हें एतराज़ हो ,
इक बार अपने लफ्जों में बयां कर दो,
जो भी इस बेरुख़ी का राज हो !

मौहब्बत जर्रे जर्रे में रौशन है,
फिर इतनी बेरुख़ी क्यों हवाओं में।
रहम टपकता है आपकी आँखों से,
फिर इतनी बेरहमी क्यों अदाओं में।

हाल पूछो सही, बताने में हर्ज़ क्या है,
दर्ज़ दिल की बताओ सही, बताओ तो मर्ज़ क्या है।

भुलाने की कोशिश ही में सही
याद तो आता रहता हूँ !
हिचकियों के ही बहाने सही
धड़कनों से जुबां तक -
गुनगुनाता रहता हूँ !!


कुछ ने दरवाज़े कुछ ने खिड़कियाँ भी बंद कर दिये अपने ,
अजी कोई सुराख़ तो छोड़ो, ताकि ख़्यालात देख सके कोई सपने।

बातों का सिलसिला, सिला फटा सा क्यों है ,
हम जिस ज़िक्र के फ़िक्रमंद हैं, ख़्याल वो छंटा हटा सा क्यों है।

दिल के दस्तावेज़ों को एक एक कर, कबाड़ियों के हाथ बेचता गया ,
वक़्त ने ज़ज़्बातों को पत्थर किये, हाथ कांपते रहे दिल रोता गया।

एहसास ठहर जाते, ज़ज़्बात मर पाते,
क्या ख़ूब गुजरता लम्हा, जो खुश-दौर मुक़र पाते।

सुबह शाम में ढूंढ लो,
ख़ास आम में ढूंढ लो।
इश्क़ कलाम में ढूंढ लो,
तन्हाई सर आम में ढूंढ लो।
बस नजरिया हूँ हर नज़र का,
नज़र तमाम में ढूंढ लो।


© raj

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