बुधवार, 12 जुलाई 2017

ख़्वाबों के लिये

भाई चाल बदल डाली है
शांति में अपनी ख़लल डाली है,
(तकलीफ़ आप तक भी जायेगी थोड़ी बहुत)
पर क्या करूँ ज़िंदगी तो यों ही है
थोड़ी भरी थोड़ी खाली है।

चाहता हूँ कुछ और
मांगता हूँ कुछ और,
पकड़ता हूँ एक छोर
चोटी मिलती है कोई और।

ये ताल मेल अंदर की सब गड़बड़ी है
धड़कनों में कुछ और जुबां पे कुछ और चढ़ी है,
होंठ हँसते हैं थिरकते हैं 
आँखों के कोर सैलाब खड़ी है।

शब्द होते नहीं भाव मिलते नहीं
दर्द मिटते नहीं घाव दिखते नहीं,
सब धोख़े हैं मुस्कुराहटों के पीछे
ख़ुद्दारी के आगे कुछ और टिकते नहीं।

वक़्त की पतवार है उम्मीदों पे सवार है
सपनों की लहरों पे क़िस्मत भी दरक़ार है,
उम्र टूटती है हर लम्हा हौंसले निखरते हैं
कांपते हाथों में अनुभव की भरमार है।

ज़रूरत ज़ज़्बात ख़िदमत हालात
उभरकर सबसे जो अब तैयार है,
जीने को लम्हें ढूंढता है और देखता है
ये कैसा आख़िर है; जो आरंभ की दीवार है!

कहता है, यही करना था तो क्या करना था
क्यों फ़ुज़ूल हसरतों में डुबोये रक्खा,
हासिल क्या हुआ जब वो फूल ही खिला
उम्रभर जिसे दिल में बोये रक्खा।

किरचों में चलते रहे आँसुओं में ढलते रहे
ज़ख़्मी पैर ख्वाइशों को फ़िसलते रहे सम्हलते रहे,
मौत ही अगर पाना होता तो क्यों इतने तूफ़ानों से गुजर आना होता
हम तो अपने ख़्वाबों के लिये हर लम्हा जलते रहे पिघलते रहे!


©raj

शुक्रवार, 30 जून 2017

बुद्ध हो चला हूँ मैं !

                                                            चित्र साभार गुगुल। 
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
दुःख मुझको थामने
हरपल है पीछे सामने
अविचल मौन निहारता
अदम्य ओज ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
दर्द मुझको ताकती
ह्रदय में के झांकती
आँखें स्थिर आलोकमय
टीस में पला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
कष्ट से क्लेश से
मन मरा कभी द्वेष से
रंज में शतरंज में
मन-युद्ध में ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
अस्त्र से शस्त्र से
शासकों सा वस्त्र से
बस प्रेम में सजा धजा
शांति के रंग से -
रची हुई कला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
अहं में तरंग में
राज पाट जंग में
निर्लोभ निष्पक्ष निर्वाह में
हर साँस ही ढला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
आग है राग है
जन्म से वैराग है
हर राह मैंने खुद चुनी
इस ज्ञान से छला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
रूप रंग रास में
भोग मय विलास में
भव्य भवन निवास में
ऐश्वर्य सब दला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही,
बुद्ध हो चला हूँ मैं !
भय भ्रम भ्रांति सब
कर्तव्य कर्म क्रांति सब
मोह मर्म माया भी
हर रोग से जला हूँ मैं!
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
प्राण हरूँ रौंदूं रक्त
खुद को ढूँढू, छोडूं तख्त
सत्य से हुआ विरक़्त
शून्य में घुला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
सदी का ख़्वाब जल रहा
विश्वास पर जला नहीं
वक़्त की ऱाख जय तिलक सा
मस्तक पे ले मला हूँ मैं। 
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!
है कतार रिश्ते यार की
अपनों ही से घिरा हुआ
पर अज़नबी है हर नज़र
नगर डगर सफ़र -
सब ही में अकेला हूँ मैं।
प्रबुद्ध ना हुआ सही
बुद्ध हो चला हूँ मैं!


©raj

गुरुवार, 22 जून 2017

बहुरंगी भाग ३

बेचैनियों में जकड़ा वक़्त,
अहसासों को बयां नहीं कर पाती है।
ज़ाहिर हो दर्द तो होता है,
हर साँस सीने में एक नमी उतर जाती है।।

मिल तो जाते हैं किसी हाल में हमराही,
बयान हाल हो पाता है अक्सर !

होना भी बहुत कम नहीं है,
बस होने का एहसास हो।
मिलना हो मुमक़िन सही,
नज़रों को तुम्हारी तलाश हो।।

मुस्कुराते हैं या नजरों से मौज़ुदगी जताते हैं ,
फ़क़त सुकून सा है ये, आप यहाँ आते जाते हैं।

आने का इत्तला, जान पाने का सुराग ,
अल्फ़ाज़ तुम्हें ही ढूंढते हैं, सुनाने को अपनी ज़ज़्बात।

मुस्कुराकर जोड़ते हो दिल,
या तोड़ती हो उम्मीदें ,
हर हाल में बस,
तुम्हें ही ढूंढती हैं ये दीदें।

नजरों के सहारे उतर जाऊं कहीं,
अब मेरी तरफ़ वो निगाहें उठाती ही नहीं।
दिल में जो मौजूद हूँ उसका क्या करोगे,
जुबां खोल कर इतना भी बताती ही नहीं।।

अब तो शिकायत का भी हक़ नहीं देती
बेशक़ तुम्हें एतराज़ हो ,
इक बार अपने लफ्जों में बयां कर दो,
जो भी इस बेरुख़ी का राज हो !

मौहब्बत जर्रे जर्रे में रौशन है,
फिर इतनी बेरुख़ी क्यों हवाओं में।
रहम टपकता है आपकी आँखों से,
फिर इतनी बेरहमी क्यों अदाओं में।

हाल पूछो सही, बताने में हर्ज़ क्या है,
दर्ज़ दिल की बताओ सही, बताओ तो मर्ज़ क्या है।

भुलाने की कोशिश ही में सही
याद तो आता रहता हूँ !
हिचकियों के ही बहाने सही
धड़कनों से जुबां तक -
गुनगुनाता रहता हूँ !!


कुछ ने दरवाज़े कुछ ने खिड़कियाँ भी बंद कर दिये अपने ,
अजी कोई सुराख़ तो छोड़ो, ताकि ख़्यालात देख सके कोई सपने।

बातों का सिलसिला, सिला फटा सा क्यों है ,
हम जिस ज़िक्र के फ़िक्रमंद हैं, ख़्याल वो छंटा हटा सा क्यों है।

दिल के दस्तावेज़ों को एक एक कर, कबाड़ियों के हाथ बेचता गया ,
वक़्त ने ज़ज़्बातों को पत्थर किये, हाथ कांपते रहे दिल रोता गया।

एहसास ठहर जाते, ज़ज़्बात मर पाते,
क्या ख़ूब गुजरता लम्हा, जो खुश-दौर मुक़र पाते।

सुबह शाम में ढूंढ लो,
ख़ास आम में ढूंढ लो।
इश्क़ कलाम में ढूंढ लो,
तन्हाई सर आम में ढूंढ लो।
बस नजरिया हूँ हर नज़र का,
नज़र तमाम में ढूंढ लो।


© raj

शनिवार, 27 मई 2017

एहसासों से दिल्लगी!

तुम्हें नहीं पता है शायद अभी!
ढूँढती हो चुपके से जभी तभी
मिल भी जाया करता हूँ अक्सर
फिर फेरती हो नजरें
मिटाती हो सिलवटें आने -जाने के ,
ख़ुद से छिपाती हो -
अपने रूह की बात
नजरें चुराती हो
पढ़ ले कोई -
दिल के कागज़ात,
हसरतों को दबा के 
धकेल देती हो चाहतों को
किसी ओर पल के लिये
किसी और वक़्त के हाथ ,
ये मौके जो हाथों की
अँगुलियों पे आज नाचती
नजर आती हैं
वही कल हालातों के
मोहताज़ हो जातीं हैं,
आज यूँ एहसासों से
दिल्लगी किया करती हो
लहरों की तरह उठती
मन की ख्वाहिशों को 
थपेड़े खाकर किनारे से
लौट जाने को
छोड़ दिया करती हो ,
प्यार की सिसकियों को
धड़कनों की थपकियों को
खुशियाँ जीने की वजहों को
यादें पिरोने के लम्हों को
खुद से हरपल दूर किया करती हो,
एक दिन इन्हीं सब में
अपनी एहसासें समा देने को
ख़ुद को भुला देने को
बेताब हो जाओगी ,
चूमने को वो ज़ज़्बात
देखने को वो बैचनी
फिर से महसूस करने को
वो प्यार
तड़प उठोगी ,
पर तब ये कर पाओगी
क्योंकि तब ये मौके
किसी और अंगुंलियों की ग़ुलाम होंगी !
खुश होना और खुशियाँ बिखेरना
प्रेम को महसुस करना और जीना
इसकी खुशबू में
सब को सुभाषित करना
सबके दिलों मे अपने-
एहसासों की छाप छोड़ना ,
सबके लिए अपनापन
और सब में अपने -
आप को महसूस करना,
ये यादों कि पोटली में
कुछ ऐसी ज़री हैं
जो जुगनूओं की तरह
ज़िन्दगी के घनघोर अंधेरे में भी
रुह को रौशन करती हैं
ख्यालों में आकर वो लम्हें
झुर्रियाँ पड़ी मायुस लकिरों में भी
तिखी गहरी मुस्कान खींच कर
कांपते हाथों में साहस भरकर
हर हालातों में खुद को ढूंढ निकालने में
जादु- सी असर करती हैं!


© raj